प्रस्तावना: भीतर की यात्रा की शुरुआत
जीवन का हर क्षण एक दर्पण है — वह हमें दिखाता नहीं कि दुनिया क्या है, बल्कि यह कि हम कौन हैं। जब मानव बाहर की ओर देखता है, तो उसे केवल परछाइयाँ दिखाई देती हैं; जब वह भीतर मुड़ता है, तभी सत्य का उदय होता है।
ध्यान (Meditation) कोई क्रिया नहीं है, यह एक स्थिति है — एक ऐसी अवस्था जहाँ विचार रुक जाते हैं, और अस्तित्व का संगीत सुनाई देता है।
आज की भागती-दौड़ती दुनिया में हममें से अधिकतर केवल जिंदा हैं, लेकिन सचमुच जी नहीं रहे। हम काम कर रहे हैं, सोच रहे हैं, योजना बना रहे हैं, परंतु अपने भीतर उतरने का समय किसी के पास नहीं। यही विस्मृति — यही असली नींद है। जागरूकता (Awareness) इस नींद से बाहर आने का नाम है।
ध्यान क्या है: न सोचना, बस होना
ध्यान कोई तकनीक नहीं है; यह तकनीक से परे की घटना है।
कल्पना कीजिए, आप शांत झील के किनारे बैठे हैं। हवा ठहरी हुई है, जल में कोई तरंग नहीं। उसी शांति में जब एक पत्ता गिरता है, तो उसकी आवाज़ स्पष्ट सुनाई देती है। वैसे ही जब मन शांत होता है, तो भीतर का सत्य सुनाई देता है।
ध्यान का अर्थ है — “जो है उसे स्वीकारना”।
विचारों को रोकने की कोशिश करना ध्यान नहीं है, बल्कि विचारों को देखना, बिना निर्णय किए देखना — यही साक्षीभाव है। यही अवेकनिंग (Awakening) की शुरुआत है।
प्रेम: जब अहं का विलय होता है
ओशो कहते थे, प्रेम वह पुल है जो व्यक्ति को व्यक्ति से नहीं, बल्कि उसे स्वयं से जोड़ता है।
संसार में हम जिस प्रेम की बातें करते हैं, वह अक्सर चाहत, अपेक्षा और स्वामित्व से भरा होता है। असली प्रेम तब जन्म लेता है जब अहं (ego) विश्राम करता है। जब तुम किसी से प्रेम करते हो बिना शर्त, बिना भय — तब तुम्हारा हृदय दैवी बन जाता है।
प्रेम कोई क्रिया नहीं, कोई संबंध नहीं, बल्कि एक अवस्था है।
यह तब घटित होती है जब भीतर सब शांत हो जाता है, जब तुम स्वयं को स्वीकार लेते हो — जैसा भी तुम हो।
फिर तुम दूसरों को बदलना बंद कर देते हो, क्योंकि तुम जानते हो कि सब कुछ पहले से ही पूर्ण है — जैसा है वैसा ही सुंदर है।
जागरूकता: अस्तित्व का सबसे बड़ा चमत्कार
जागरूकता का मतलब है — नींद को पहचानना।
जब तुम क्रोध में हो और उसे देख पाते हो, तो तुम क्रोध से धीरे-धीरे अलग हो जाते हो। जो देख सकता है, वह उस घटना का हिस्सा नहीं रह जाता।
इसीलिए ओशो कहते थे — “देखना ही परिवर्तन का रहस्य है।”
जब कोई व्यक्ति हर क्षण सजग हो जाता है, तो जीवन में सहजता और मौन उतरने लगता है।
फिर न कोई द्वंद्व बचता है, न कोई भय।
तब भीतर एक नृत्य जागता है — ऐसा नृत्य जो किसी उत्सव का हिस्सा नहीं, बल्कि स्वयं उत्सव बन जाता है।
ध्यान का अभ्यास: अनुभव की दिशा
- साँस पर ध्यान दो:
बस अपनी साँस को महसूस करो, उसे नियंत्रित मत करो। वह भीतर आ रही है, बाहर जा रही है — उसे साक्षीभाव से देखो। - विचारों को आने दो:
ध्यान में विचार आते रहेंगे। उन्हें रोकने की जगह, उन्हें गुजरते बादलों की तरह देखो। - शरीर को ढीला छोड़ो:
जब शरीर सहज होता है, तो मन स्वतः शांत होने लगता है। - कुछ मत करो, बस रहो:
धीरे-धीरे तुम्हें महसूस होगा कि तुम ‘करने’ से ‘होने’ की ओर बढ़ रहे हो। यही ध्यान की असली शुरुआत है।
प्रेम और ध्यान का संगम
प्रेम बिना ध्यान के अंधा है, और ध्यान बिना प्रेम के निष्प्राण।
जब ध्यान प्रेम के साथ चलता है, तो जीवन में करुणा जन्म लेती है।
फिर तुम केवल मनुष्य नहीं रह जाते — तुम एक ऊर्जा हो जाती हो जो हर दिशा में फैलती है।
ओशो ने कहा था, “ध्यान तुम्हें केंद्र देता है, प्रेम तुम्हें दिशा देता है।”
जब यह दोनों मिलते हैं, तो व्यक्ति भीतर से फूल की तरह खिल उठता है।
निष्कर्ष: भीतर की रोशनी जगाओ
हर व्यक्ति के भीतर एक स्रोत है — शांति का, आनंद का, प्रेम का।
पर हम बाहर के कोलाहल में उस स्वर को सुन नहीं पाते।
ध्यान वह द्वार है जो हमें हमारे भीतर के घर तक पहुँचाता है।
एक बार जब तुम अपने भीतर की सुन लेते हो, तो बाहर की कोई भी परिस्थिति तुम्हें हिला नहीं सकती।
जागरूकता ही असली क्रांति है।
वह किसी आंदोलन की तरह नहीं, बल्कि एक मौन क्रांति की तरह घटती है — अंदर से, धीरे-धीरे, लेकिन पूरी जीवनधारा को बदल देती है।
अब समय आ गया है कि हम अपने भीतर लौट जाएँ।
भक्ति से नहीं, भय से नहीं, बल्कि प्रेम और जागरूकता के साथ।
क्योंकि वही प्रेम, वही साक्षीभाव — हमें जीवन की सबसे गहरी सच्चाई तक ले जाता है।


