जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि मनुष्य हर जगह कुछ पाने की दौड़ में लगा है — लेकिन खुद को ही भूल गया है। हर पल, हर सांस में वह कुछ खोजने की कोशिश करता है जिसे वह पहले ही खो चुका होता है — अपनी सामर्थ्य को, अपनी चेतनाको, अपने अस्तित्व को। और यही भूल ने उसे संसार का यात्री बना दिया है, जबकि उसका असली मार्ग भीतर की ओर है।
ध्यान कोई विचार नहीं, कोई क्रिया नहीं — यह अविचार की अवस्था है। एक बूँद जब सागर में विलीन होती है, वही ध्यान है। पर मनुष्य सागर बनना तो चाहता है, मगर बूँद छोड़ने से डरता है।
जब तुम ध्यान में उतरते हो, तुम पाते हो कि प्रेम कोई भावना नहीं है — यह अस्तित्व की सुगंध है। तुम किसी से प्रेम करना नहीं सीखते, तुम बस प्रेम बन जाते हो। और उस क्षण, तुम्हारा हृदय किसी कवि की कविता नहीं, ब्रह्मांड की अनंत धड़कन बन जाता है।
ओशो कहते थे — ‘‘ध्यान कोई प्रयास नहीं, यह सहज गिरना है — तुम्हारे अपने भीतर।’’
सच तो यह है कि ध्यान कोई लक्ष्य नहीं, बल्कि घर लौटने की अनुभूति है। वह घर जहाँ से तुम आए थे, जहाँ तुम अब भी हो, बस भूल गए हो।
1. मौन की भाषा को सुनो
हम शब्दों से इतने भर गए हैं कि मौन हमसे डरने लगा है। लेकिन सच्चा संवाद मौन में होता है। जब तुम मौन में उतरते हो, तुम सुनने लगते हो — पक्षियों की गूंज नहीं, बल्कि अपने भीतर की शांति की धुन। और वहीं से ध्यान का आरंभ होता है।
मौन केवल ध्वनि की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि ‘मैं’ की अनुपस्थिति है। जब ‘मैं’ मिटता है, अस्तित्व बोलता है।
2. जागरूकता का अर्थ
जागरूकता का अर्थ है — हर क्षण सजग रहना। जो खा रहा है, जो चल रहा है, जो देख रहा है — वही देखना, वही करना। न अतीत में जीना, न भविष्य में भागना। वर्तमान के फूल को उसके पूरे रंगों में जी लेना।
जब तुम पूरी जागरूकता से सांस लेते हो, तो वही सांस ध्यान बन जाती है। और जब तुम पूर्ण रूप से देखते हो, वही दृष्टि प्रेम बन जाती है। जागरूकता प्रेम को जन्म देती है, क्योंकि वह भय को समाप्त करती है।
3. प्रेम बिना स्वामित्व के
प्रेम किसी को पाने का नहीं, उसे मुक्त करने का नाम है। स्वामित्व का प्रेम मृत्यु है — जागरूक प्रेम जीवन है।
जब प्रेम में ध्यान की महक होती है, तब वह बंधन नहीं बनता, बल्कि मुक्ति का द्वार खोलता है।
एक सच्चा संबंध दो स्वतंत्र आत्माओं का मिलन होता है, जहाँ कोई किसी का केंद्र नहीं, बस सहयात्री होता है।
4. ध्यान और प्रेम का संगम
ध्यान और प्रेम दो पंख हैं, जिनसे आत्मा उड़ान भरती है। ध्यान तुम्हें भीतर ले जाता है, प्रेम तुम्हें बाहर खिलाता है।
जब दोनों एक हो जाते हैं, तो जीवन एक मधुर संगीत बन जाता है — जहाँ प्रार्थना भी नाचती है और मौन भी मुस्कुराता है।
ध्यान के बिना प्रेम अंधा है, और प्रेम के बिना ध्यान सूखा।
लेकिन जब दोनों मिलते हैं, तो मनुष्य देवत्व को छूने लगता है।
5. भीतर की क्रांति
सच्चा क्रांतिकारी वही है जो अपने भीतर विद्रोह करता है — जो आँखें मूँदकर नहीं मानता, बल्कि देखता है कि सत्य क्या है।
ध्यान विद्रोह है, क्योंकि वह परंपरा को तोड़ता है; वह तुम्हें सीधा तुम्हारे मूल तक ले जाता है।
जैसे ही तुम ध्यान में उतरते हो, तुम्हारा मन खोखला होने लगता है, पर उसी खोखलेपन में दिव्यता उतरती है।
जैसे बादल हटने पर चाँद दिखता है, वैसे ही विचारों के हटने पर आत्मा प्रकट होती है।
6. यात्रा नहीं, अवतरण है
ध्यान कोई यात्रा नहीं, यह अवतरण है — ऊपर से नीचे की नहीं, भीतर से भीतर की ओर।
तुम जब भी भीतर जाते हो, तुम ब्रह्मांड के केंद्र को स्पर्श करते हो। और एक बार यह स्पर्श हो गया, तो भय, मृत्यु, दुख कुछ भी भयावह नहीं रह जाता।
ध्यान वह चाबी है जो तुम्हें तुम्हारे असली घर का द्वार दिखाती है। और जब यह द्वार खुलता है, तो प्रेम अपने आप प्रकट होता है, क्योंकि प्रेम ध्यान का फूल है।
अंत में:
ध्यान का अर्थ है — उपस्थित रहना।
प्रेम का अर्थ है — वितरित रहना।
दोनों मिलकर चेतना को पूर्ण करते हैं।
और यही जीवन का सार है।
जब तुम प्रेम और जागरूकता में एक हो जाते हो, तब जीवन केवल जीने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि आनंद का उत्सव बन जाता है।
वहीं से शुरू होती है — मौन की असली यात्रा।


